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संपादक
By   V.K Sharma 18/05/2018 :11:29
लोकतंत्र में पहले तो कभी नहीं थी यह बेबसी
 
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद नाटकीय घटनाक्रम में भाजपा नेता बीएस येदियुरह्रश्वपा को राज्यपाल वजुभाई वाला ने सुबह-सुबह राजभवन में ही मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाकर तमाम कयासों और अफवाहों को विराम लगा दिया।

कड़ी सुरक्षा और व्यवस्था के बीच जहां एक ओर येदियुरह्रश्वपा शपथ ले रहे थे वहीं दूसरी तरफ राजभवन के वाहर पूर्ण बहुमत होने का दावा कर रही कांग्रेस और जेडीएस विधायक धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहला अवसर रहा होगा जबकि इस तरह का नजारा देखने को मिला है। खास बात यह है कि इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने देर रात तक इस मामले की सुनवाई की और येदियुरह्रश्वपा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इनकार कर याचिकाकर्ताओं को मायूस कर दिया। बहरहाल लोकतंत्र की इसे विशेषता कहें या खूबसूरती कि बिना हिंसा और खून-खराबे के सरकारें बदल जाती हैं और जनादेश को सिर-माथे पर लगाकर खुशी-खुशी कुर्सी छोड़ राज करने वाले लोग विरोधी खेमे में जा बैठते हैं। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि लोकतंत्र अपने आप में जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा चलाए जाने वाले शासन को समेटे होता है। अगर इसके साथ थोड़ी भी छेड़छाड़ होती है तो संकट लोकतंत्र के लिए खड़ा हो जाता है, और शक होने लगता है कि कहीं हम भीड़तंत्र या पुन: राजशाही के दौर में तो प्रवेश नहीं कर गए हैं। इसलिए लोकतंत्र के हिमायती सरकारों के काम-काज पर पैनी नजर रखते हैं और लीक से जैसे ही हटकर कोई योजना बनती है या उनका क्रियांवयन होता है तो देश के असली मालिकों अर्थात आमजन को सचेत करते हुए बतलाते हैं कि जो हो रहा है वह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। बहरहाल कई बार ऐसा हो जाता है जो लोकतंत्र को कमजोर करने वाला साबित होता है। ऐसा ही पिछले कुछ समय से जनादेश को लेकर देश में होता हुआ दिखाई दे रहा है। इसलिए एक बार फिर सचेत करने का समय आ गया है कि यदि जनादेश
की अनदेखी हुई और सरकारों ने अपनी मर्जी इस पर थोपी तो परिणाम लोकतंत्र के लिए घातक भी हो सकते हैं। खासतौर पर तब जबकि न्यायपालिका से भी न्याय की उम्मीद विपक्ष को न रह जाए और वह नाउम्मीदी के चलते सडक़ों पर आने को मजबूर हो जाए। दरअसल गोवा के बाद कर्नाटक में जो कुछ होते हुए देखा जा रहा है वह जनादेश के विपरीत उठाया गया कदम बताया गया है। दरअसल कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम देखें तो मालूम चलता है कि यहां किसी भी दल के पास पूर्ण बहुमत नहीं है। जहां एक ओर भाजपा 104 सीटें लेकर सबसे बड़े दल के तौर पर सामने आई है तो वहीं वह सरकार के लिए तय आंकड़ा 112 को छू भी नहीं पाई है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने पहले ही जेडीएस को समर्थन देकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया, जिससे कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के पास 116 सीटें हो गईं। यह आंकड़ा सरकार बनाने में सक्षम साबित होता है। अब भाजपा से ज्यादा सीटें और समय से पहले राज्यपाल के पास दावा पेश करते कांग्रेस और जेडीएस नेताओं को दरकिनार कर भाजपा को सरकार बनाने का न सिर्फ न्यौता दिया गया बल्कि शपथ ग्रहण समारोह भी आयोजित कर दिया गया। इससे यही संदेश जा रहा है कि अब 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाला फार्मूला ही काम कर रहा है और आगे भी यही होगा। इसलिए कहा भी जा रहा है कि केंद्र में मोदी सरकार के रहते हुए किसी की, कहीं भी, कोई सुनवाई होने वाली नहीं है। कम से कम गोवा और अब कर्नाटक मामले में तो यही देखने को मिला है। गोवा में भी किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं होते हुए भी भाजपा सरकार बनाने में सफल रही। खास बात यह थी कि गोवा में कांग्रेस को सबसे अधिक 17 सीटें हासिल हुईं थीं, तब भी उसे सरकार बनाने का न्यौता नहीं दिया गया, जबकि कर्नाटक में भाजपा को दे दिया गया। दोनों ही जगह जोड़-तोड़ कर भाजपा सरकार बनाने में सफल रही। बहुमत हासिल करने वाली कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन को दरकिनार कर भाजपा की सरकार बनाने के लिए जिस तरह से कवायद की गईं
उससे साफ जाहिर होता है कि सरकारी तंत्र का बेजा इस्तेमाल हुआ है। 

इसे देखते हुए ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा था कि सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा के पास बहुमत नहीं है, जबकि कांग्रेस और जेडीएस के पास 117 विधायकों के साथ बहुमत है। इस प्रकार राज्यपाल को इन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए, लेकिन जब लोकतांत्रिक जनादेश को कोई सिरे से खारिज कर रहा हो तो न्याय की बात कैसे की जा सकती है। बजाय इसके अब होना यह है कि कांग्रेस और जेडीएस विधायकों को किसी भी तरह से तोडक़र भाजपा बहुमत हासिल करने की कोशिश करेगी। इसके लिए जैसा कि कांग्रेस और जेडीएस नेता आरोप लगा चुके हैं कि भाजपा नेता उनके विधायकों को करोड़ों रुपये देने और साथ ही मंत्री पद दिलवाने का लालच भी दिया गया है, जैसा कि आरोप लगाए जा रहे हैं, ताकि वो उन्हें समर्थन दे दें। अब जरुर यह सही साबित हो सकता है। सभी जानते हैं कि सरकार बनाने या बचाने के लिए इस तरह के हथकंडे सत्ता पक्ष पहले से करता आया है, लेकिन इसमें एक नया सूत्र और तब जुड़ता है जबकि सरकार और उसके नुमाइंदे किसी बड़े कारोबारी जनप्रतिनिधि को उसके कारोबार या व्यापार के चलते रहने या बंद किए जाने का हवाला देते हुए अपने पक्ष में करते हैं या दागी जनप्रतिनिधियों पर महज इसलिए दबाव बनाया जाता है कि समर्थन नहीं करने पर उनकी 'बंद फाइलें' खोली जा सकती हैं और अन्य आरोपी नेताओं की तरह वो भी जेल की हवा खा सकते हैं। इसके बाद उनका हाल मरता क्या न करता जैसा होना स्वभाविक है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जबकि किसी दूसरी पार्टी के जनप्रतिनिधि को इन्हीं आधार पर अपने साथ मिलाया गया, यहां तक उनसे इस्तीफा लिया गया बाद में चुनाव लड़वाकर दोबारा
जनप्रतिनिधि बनवाया गया और फिर उन्हें बतौर ईनाम मंत्रीपद से भी नवाज दिया गया। अब यही खेल यदि कर्नाटक में खेला जा रहा है तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। जहां तक न्यायिक लड़ाई की बात है तो कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियां अच्छी तरह से जानती हैं कि जो हाल पहले महाभियोग प्रस्ताव का राज्यसभा और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में हुआ वही हाल उनकी इस याचिका का भी होना है, बावजूद इसके प्रयास तो करने ही चाहिए और वही किया गया। अत: अब इस मामले में कानूनी या न्यायिक लड़ाई लडऩे से बेहतर होगा कि अपने विधायकों को अपने पक्ष में मजबूती के साथ रखें और जब राज्यपाल के समक्ष विधायकों की संख्याबल दिखाने की बात हो तो उन्हें पेश किया जाए।



V.K Sharma
Editor in Chief
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