नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड) : सुन्दर मनोरम अरावली पर्वत शृंखलाओं के बीच बसा, सर्व संसाधनों से युक्त ग्राम सारसोप, जहां सर्व समाज के लोग निवास करते हैं। अरावली पर्वत माला मे अनेक देव स्थान होने और यहा की आराध्य माँ चामुंडा और चारभुजा नाथ के चमत्कार अवर्णनीय हैं, फिर भी मैं आपको यहां के चमत्कारों.से अवगत कराने की कोशिश कर रहा हूँ।
*1. चतुर्भुज नाथ: भगवान विष्णु की चतुर्भुज रूप में प्रतिष्ठित प्रतिमा जो बातें करती है। आपको अचंभा हो रहा होगा कि कलयुग में ये कैसे संभव हो सकता है, पर संभव है।
*पुराने समय में गाँव के कुछ लोग मंडावर गांव, जो हमारे यहा से पश्चिम दिशा मे टोंक रोड पर स्थित है, से लौट रहे थे।वो रात्रि मे एक मन्दिर के पास से गुजर रहे थे तो उनको एक आवाज सुनाई दी 'रूको! कहां जा रहे हो? मुझे भी ले चलो, मै यहां परेशान हो चुका हूं।'
लोग डर गये, फिर हिम्मत करके चारों ओर देखा, कुछ नही था वहाँ, सिर्फ एक मन्दिर था।
वो मन्दिर में गये, वहां भी कोई नही था।दूर-दूर तक सन्नाटा, न परिन्दा न परिन्दे की जात, उनको लगा कि उन्हे भ्रम हुआ है। वो मन्दिर से निकल के जाने लगे कि फिर आवाज आई कि 'सुनो! डरो नहीं, मैं बोल रहा हूँ।'
यात्री घबरा कर चारो तरफ देख आए, अंत मे उन्हे लगा कि ये मूर्ति बोल रही है।वो डर रहे थे फिर सबने निश्चय किया कि जब भगवान स्वयं बोल रहे हैं तो ले चलते हैं।
इस प्रकार वो चतुर्भुज नाथ की मूर्ति लेकर गांव आ गये। दूसरे दिन पंचो को इकट्ठा किया और रात वाला वृतान्त कह सुनाया और उन्हें मूर्ति दे दी। पंचायत ने उस मूर्ति को मन्दिर मे प्रतिष्ठित करवा दिया
तब से आज तक सारसोप गांव के नाथ स्वयं चार भुजाओ से गांव में सुख-शांति, उन्नति, और वृद्धि करते आ रहे हैं। उन का चमत्कार किसी से छिपा हुआ नही है।
*पुजारी जी को चमत्कृत किया: इस मन्दिर की पूजा शुरू से ही चार पाराशर ब्राहमण पुजारी परिवारों द्वारा होती आ रही है।
संवत 1956 के छप्पन्या के अकाल की बहुत चर्चा होती है उस अकाल के समय हमारे गाव के बहुत से परिवार रोजी-रोटी के जुगाड मे गांव छोड के चले गये। उस समय के पुजारी जी रामलाल जी पाराशर विद्वान और उच्च कोटि के ज्ञानी थे।
उनका बडा परिवार गरीबी झेलता,फिर भी वो दुख सुख वही रहकर भगवान चतुर्भुज नाथ की पूजा अर्चना करते रहे। उस समय लोगों के पास खाने-पीने तक का नही था, लेकिनभगवान ने उन्हें कहा- 'आपको कही जाने की आवश्यकता नहीं है, आप यहीं रहो, सब स्थितिया सामान्य हो जायेगी।' और भगवान की कृपा से पुजारी जी को एक चांदी का सिक्का रोज मन्दिर मे मिलने लगा।
*एक व्यक्ति राजदंड मे जिसके हाथ काट दिये गये थे, वो मन्दिर के गोखडे पर पडा रहता था। किसी ने खाने को दिया तो खा लिया, पानी पिलाया तो पी लिया। बहुत दिनो तक वैसे ही भगवान के चरणों मे प्रायश्चित करता रहता। एक दिन की बात, किसी ने खाने पीने को नही दिया, आदमी भूख तो सहन कर सकता है पर प्यास नहीं। वो भंयकर प्यास से आक्रान्त तड़पता हुआ भगवान से प्रार्थना करने लगा कि 'हे नाथ, जाने कौन-कौन से गलत कर्मो की सजा आपने दी है। मुझे माफ करो, मेरी रक्षा करो।' प्यास से बैचेन अपने जीवन काल के समस्त पापों को याद करके शरणागत वत्सल भगवान चतुर्भुज नाथ को याद करता रहा। अंत मे भगवान मनुष्य रूप मे स्वयं पीतल के घड़े मे शीतल जल लेकर आये, उसको पानी पिलाया और उसके दोनों हाथों को स्पर्श किया। उसके दोनो हाथ पहले जैसे हो गए। ये चमत्कार उसने प्यारे लाल सैन, जो नशे पते में मन्दिर में ही रहता था, को बताया। उसके बाद वो आदमी भी कभी दिखाई नहीं दिया।
इस तरह भगवान ने यहां प्रत्यक्ष और परोक्षबहुत चमत्कार किये हैं।
*अनेक बार यहां चोरी की कोशिश की गई, चोर सफल नही हो सके और अंधे हो गये। शिवाड घुश्मेश्वर महादेव मन्दिर मे भी इन पुजारियो की सेवा आती है।पुजारी अमर लाल जी पाराशर मंदिर बंद करके शिवाड जाने को तैयार हुए और घाटी के रास्ते शिवाड जा रहे थे। पीछे से एक चोर मन्दिर मे घुस गया (पहले मन्दिर में ताला नही लगता था)
चोर ने सब आभूषण अंगोछे मे बांध लिये और निकलने ही वाला था भगवान के चमत्कार से वो अंधा हो कर चारों तरफ घुमता रहा। लेकिन उसे रास्ता नही सूझ रहा था। पुजारी जी आधे रास्ते पहुंच चुके थे पर उनके मन मे कुछ भ्रम हुआ तो वो वापस लौट आये। मन्दिर में देखा तो एक आदमी भगवान के आभूषणों को लेकर गोल-गोल घूम रहा है। उन्होने आवाज दी 'कौन है?' वो बोला महाराज जी,चोर हूं, चोरी कर ली पर अब मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। मेरी रक्षा करो।' वह माफी मांगने लगा।
पुजारी जी ने बोला 'सब आभूषण रख दो और माफी मांगो।'
चोर ने आभूषण रख दिये, धीरे धीरे उसकी दृष्टि आ गई और वो प्रणाम करके चला गया
अमरलाल जी के बाद विजय नारायण जी पाराशर और अब उनके पोत्र हरीश जी पाराशर अनवरत सेवा पूजा करते आ रहे हैं।
*एक चोरी तो मेरे सामने हुई, चोरों ने बडे हथियार से ताला तोड़ा, पुजारी नवीन पाराशर का चोरों से मुकाबला हुआ, चोर भाग गये। नवीन जी को चोट आई पर भगवान ने उनकी रक्षा की। दूसरे दिन पंचो को नवीन जी ने बोल दिया 'मैं मन्दिर मे नही सोऊँगा।' वो भगवान के जेवर उतार कर घर ले गये, सारी रात उनको नींद नही आई। सपने में भगवान ने कहा कि मेरे जेवर वापस पहना दो, मैं अपनी रक्षा स्वयं कर सकताहूँ।' दूसरे दिन आभूषण उनको धारण करा दिए गए।
*भगवान के मन्दिर मे एक विशाल सर्प रहता है जिसे शेषनाग भी कहो तो कोई अतिशयोक्ती नहीं होगी। वो दिखता है पर रहता कहाँ है कोई नही जानता।
*एकादशी का जागरण यहाँ अनेक वर्षों से अनवरत होता आ रहा है। यहां के गायक बहुत प्रसिद्ध थे, उस्ताद गंगाबिशन जी, रामनाथ जी मोतीलाल जी राॅव रामनारायण जी जोशी मथुरा लाल जी जोशी और अन्य ब्राहमण लोग शास्त्रीय संगीत के प्रखर गायक और वक्ता थे। उन लोगों ने एकादशी का जागरण शुरू किया। वो निशुल्क भजन करते थे, ये जागरण आज तक अनवरत चलता आ रहा है।चारभुजा नाथ की कृपा और भजनों के प्रभाव से आज इन सब लोगों की पीढियां अपने-अपने क्षेत्रो में अपने गाँव और परिवार का नाम रोशन कर रही है।
*वर्षो से यहा अंखंड ज्योति गांव वालो के सहयोग से निरन्त चलती आ रही है।
*सन् 2000 मे मुम्बई वाले रामस्वरूप जी ने भव्य श्रीमद् भागवत के पाठ व महामृत्युजंय के जप श्री राम लक्ष्मण जी महाराज के मन्दिर मे करवाये बहुत ही भव्य आयोजन था कथा वाचक चित्र कुट वाले मुम्बई से ही आये थे उस आयोजन के बीच एक दिन हमारे गुरूजी श्री श्री 1008 श्री कचीदा वाले बाबा भी गांव मे पधारे वो कुछ क्षण श्री मद्भागवत कथा मे बैठकर वापस श्री चार भुजानाथ मंदिर के बाहर जो गोखडे बने हुये है।वहा आकर बैठ गये उनकी प्रसिद्धि सुनकर भागवत और महामृत्युजंय करवा रहे पंडित लोग उनके दर्शन को आये बाबा के सामने गाव वाले और बाहर के पंडित गण इकट्ठे हो गये वार्तालाप शुरू हुआ बाबा ने कहा कि ये मूर्ति मे स्वयं नारायण यहा निवास करते है।और ये जगह बहुत शीघ्र वापस जाग्रत होने वाली है।पर इसमे किसी भी प्रकार की राजनीति हुई तो वो गलत होगा।
*सन 2005 मे भंयकर अकाल मे भगवान ने भाइ साहब वैजन्त जी गुर्जर को रामधुनी श्रीराम नाम संकीर्तन की प्रेरणा दी।बैजन्त जी ने श्रावणमास मे भगवान की रामधुनी छोटे छोटे बच्चो और कुछ भगवत् प्रेमी लोगो के साथ शुरू कर दि महिने भर अच्छा आयोजन और चहल पहल हो रही थी अंत मे पूर्णाहुति मे गांव वालो के सहयोग से हवन कुंड विशेष यज्ञ का आयोजन हुआ गांव वालो पे भगवान की प्रेरणा से उस कार्यक्रम मे बढ चढकर हिस्सा लिया विशेष सहयोग उस समय के तत्कालीन संरपंच ग्राम पंचायत सारसोप श्री सत्यनारायण जी का रहा अच्छे पैसे गांव वालो ने सबने अपनी इच्छानुसार दिये ।तीन दिन तक अच्छा गांव मे चतुर्भुज नाथ का मेला भरने लगा
*मन्दिर समिति ने बचे हुये पैसो से मन्दिर मे मार्बल लगवा दिया
इसी प्रकार अगले वर्ष से रामधुनी श्रावण मास मे बैजन्त जी की अध्यक्षता और भगवद प्रेमी लोगो के सहयोग से श्रावणमास मे शुरू हो गई और भाद्रपद मास मे पूर्णाहुति स्वरूप तीन दिवसीय मेला और हवन का कार्यक्रम शुरू हो गया इसमे गांव वालो का बहुत अच्छा सहयोग सरपंच सत्यनारायण जी गौत्तम के सान्निध्य मे बहुत अच्छा रहा भगवान चतुर्भुज नाथ की शोभायात्रा मे लगभग 5 लाख रूपये गांव से चढावा सहयोग प्राप्त हुआ अब आप लोग समझ सकते है।अकाल मे पांच लाख रूपये का चढावा किसी चमत्कार से कम नही है। इन पैसो से भगवान के मन्दिर को भव्य स्वरूप और विस्तार समिति गांव के पंचो के द्वारा दिया जाने लगा।लगभग 2010 तक ये कार्यक्रम अनवरत चलता रहा फिर भगवान की मर्जी से राजनीतिकरण होने से वो कार्यक्रम सब बंद हो गये और मंदिर आज भी निर्माणाधीन पडा है।
रामनारायण जी जोशी भगवान चतुर्भुज नाथ के अनन्य भक्त सरल व्यक्तित्व जो मिला जैसा मिला संतुष्टी ब्राहमण थे ।दोपहर मे भगवान चारभुजा नाथ की परिक्रमा मे आराम करते रात्री मे सब सत्संगी लोग उस्ताद गंगा बिशन जी रामनाथ जी मोतीलाल जी सब मिलकर भगवान गुणानुवाद भजन कीर्तन किया करते थे।उनको अपनी मृत्यु की तिथि भगवान ने स्वप्न मे दर्शन देकर बता दी थी ।उन्होने हमको बताया पर हमने विश्वास नही किया।नियत तिथि भाद्रपद कृष्णा 2 दोपहर 2।50 पे उनका देहावसान ब्रम्हरॅन्ध्र से प्राण निकल गये।
उस समय भगवान चार भुजानाथ मन्दिर के बगल मे एक कमरा था उसमे दुर्गाशंकर जी सोनी व उनकी माताराम रहते थे ।माताराम ने देखा कि भगवान का विमान बाहर निकला उनको बडा अचंभा हुआ कि आज तो डोल ग्यारस भी नही और कोई पर्व भी नही फिर विमान बाहर कैसे फिर वो विमान सामने वाली गली मे गया और कुछ मिनटो बाद ही सूचना आइ कि जोशी जी का देहावसान हो गया
उन्होने ही सब लोगो को ये वृतान्त बताया इस प्रकार के भक्त और भगवान का संबधो के यहा बहुत से प्रमाण है।जो शत प्रतिशत सत्य है।
बहुत वर्षो से पहले ग्राम सारसोप मे मूलजी अरोडा मिठाई की दुकान किया करते थे उनके पेडे और मिठाई उस जमाने मे बहुत प्रसिद्ध थी भगवान चारभुजा नाथ के अनन्य भक्त रोजाना अपनी दुकान के शुद्ध मावे से बने दो पेडे भगवान को रोजाना जाकर भोग लगवाते थे उनका ये रोजाना का दैनिक काम था रोज सुबह शाम दर्शन और उनकी दुकान की मिठाई का भगवान को रोज भोग लगता एक दिन संयोगवश मूलचन्द जी अरोडा आवश्यक कार्यवश या किसी कारणवश भगवान के प्रसाद नही पहुचा पाये रात्री मे भगवान स्वयं स्वप्न मे भक्त के पास पहुच गये कि भक्त आज तो भूखा ही रख दिया बोले तेरी मिठाई के बिना तृप्त नही होता हू सुबह उठने के बाद उनको अपनी गलती का अहसास हुआ उस दिन से आज तक अरोडा जी की दूकान के पेडो का भोग लगता आ रहा है।
दूसरी कहानी मूलचन्द जी अरोडा के सब परिवार वाले कही भात लेकर गये थे घर पर मूलजी अरोडा और उनके एक बेटे उनके पास थे।अंत समय यमदूत आ गये घर पर कोई भी नही होने के कारण उन्होने यमदूतो से सप्ताह भर की मोहलत मांगी यमदूतो ने अस्विकार कर दिया कि ऐसा संभव नही हो सकता फिर अरोडा जी ने भगवान चार भुजा नाथ को अरदास लगाई कि हे प्रभु मेरे को सात दिन का जीवन दान दीजिये ताकि मै सात दिन आपके भोग को अनवरत रख सकू भगवान ने यमदूतो को आदेश दिया की सात दिन बाद अरोडा जी को ले जाये।यमदूतो ने कहा प्रभु ये विधान के अनुसार नही है।अब आफ बताओ किसको लेकर जाये तो उनको आदेश मिला कि हजारी लाल जी अग्रवाल को ले जाओ। उस दिन फिर हजारी लाल जी जैन गूणीवालो का देहावसान हुआ
फिर सात दिन बाद मूलचंद जी का नंबर आया उन्होने पूरे परिवार रिश्तेदारो को बुलाकर सातवे दिन सबसे मिलजुल कर स्नान करके भगवान चारभुजानाथ के चरणो मे ध्यान लगा शरीर छोडने से पहले उन्होने अपने पुत्र श्री गोवर्धन जी अरोडा को बोला कि भगवान के इस दो पेडे के प्रसाद को कभी बंद न करे तब से गोरधन जी और आज उनका पुत्र ललित अरोडा इस कार्य को बडी ईमानदारी पूर्वक करते आ रहे है।