आश्रमों और योगियों की आध्यात्मिक क्षमता हो सकती है महत्वपूर्ण: रवि डबराल
नई दिल्ली आज के तनाव भरे व्यक्तिगत जीवन तथा कॉर्पोरेट दौर को देखते हुए भारत को हिमालय स्थित आश्रमों में छात्रों के लिए एमबीए एवं डिग्री कोर्सेज में कुछ हफ्तों का कोर्स लागू करना चाहिए। छात्रों को इन पवित्र स्थानों पर एकांत में पढऩे और आध्यात्मिक ज्ञान पाने का अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
पुस्तक के लेखक रवि डबराल ने बताया। जिन्होंने हाल ही में अपनी स्थानीय भाषा अंग्रेजी में नई पुस्तक ‘ग्रीड लस्ट एडिक्शन’और हिंदी में ‘लालच वासना लत’ का लान्च सिंगापुर में किया था। एह्रश्वपल के स्टीव जाब्स और फेसबुक के मार्क जुक़ेरबर्ग ने हिमालय में स्थित आश्रमों और योगियों के संरक्षण में आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ा है। ‘इन उदाहरणों के मद्देनजऱ आध्यात्मिक पाठ्यक्रमों को उच्च शिक्षा, डिग्री कोर्सेज और एमबीए में शामिल किया जाना चाहिए।’ उन्हें हिमालय में स्थित आश्रमों और योगियों का महत्व देर से समझ में आया। ‘मुझे यह जानकर शर्मिंदगी का एहसास हुआ कि विदेशी लोगों ने हिमालय की गुरूओं और योगियों की ताकत को पहले पहचाना, जबकि उत्तराखण्ड का निवासी होने के बावजूद मैं इसके महत्व को नहीं समझ पाया।’ डबराल ने कहा। उनका जन्म उत्तराखंड में हुआ था, जो अपने आध्यात्मिक आश्रमों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इस भूमि में अपने प्रारंभिक वर्षों का प्रभाव उनके अधिकांश कार्यों में देखा जा सकता है। 46 वर्षीय डबराल सिंगापुर में कमोडिटी ट्रेडर हैं। उन्हें नवम्बर 2016 में बैंकाक में द इण्डियन अचीवर्स फोरम की 10वीं इंटरनेशनल सेमिनार के दौरान ‘इंटरनेशनल मैन आफ एक्सीलेंस अवार्ड फार एजुकेशन, कोरपोरेट एण्ड सोशल सर्विसेज़’ के अंतर्राष्ट्रीय विजेता के रूप में भी सम्मानित किया गया।