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राजनीति
By   V.K Sharma 10/03/2019 :23:20
Loksabha Election 2019 : आज लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही लागू की आचार संहिता,7 चरण मे होगी वोटिंग, 10 राज्यों की 20 बड़ी सीटें !
 








नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड) आकाश मिश्रा : लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल बज गया है। चुनाव आयोग ने आज देश के 543 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया। विज्ञान भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने फेज वाइज चुनाव की तारीखों का ऐलान किया।  इस बार के चुनाव 7 चरण में होंगे। 11 अप्रैल को पहले चरण का मतदान होगा। दूसरे चरण का चुनाव 18 अप्रैल, तीसरा चरण का चुनाव 23 अप्रैल , चौथे चरण का चुनाव 29 अप्रैल, पांचवे चरण का चुनाव 6 मई , छठे चरण का चुनाव 12 मई और 7वें चरण का चुनाव 19 मई को होगा. 23 मई को परिणाम घोषित किए जाएंगे इस बार  उत्तर प्रदेश जनसंख्या के आधार पर देश का सबसे बड़ा राज्य है। राज्य में कुल 80 लोकसभा सीटें हैं, जो देश में किसी एक राज्य में सबसे अधिक हैं। यही कारण है कि देश की राजनीति, खासकर केंद्र की सरकार के लिहाज से यूपी अहम राज्य है। ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से राज्य की राजनीति पर पूरे देश की नजर है। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में  भाजपा की सरकार है। हालांकि मुलायम सिंह और उनके पुत्र अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल भी राज्य के महत्वपूर्ण राजनीतिक दल हैं।। इस बार चुनाव में वाराणसी, रायबरेली, अमेठी, अमृतसर, गांधीनगर समेत 10 राज्यों की 20 बड़ी सीटों पर नजर रहेगी।2014 में इन 20 सीटों में भाजपा ने 11 और कांग्रेस ने 7 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2 सीटें अन्य दलों के खाते में गईं थीं। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही देशभर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गया है। मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल 3 जून को खत्म हो रहा है। सत्तारुढ़ दलों के लिए चुनाव आचार संहिता लागू होने का बड़ा मतलब होता है।
क्योंकि इसके बाद कोई भी सरकार मतदाताओं को लुभाने वाली घोषणा नहींं कर सकती है। जानिए क्या होती है चुनाव आचार संहिता -
चुनाव आचार संहिता चुनाव आयोग के बनाए वो नियम हैं, जिनका पालन हर पार्टी और हर उम्मीदवार के लिए जरूरी है। इनका उल्लंघन करने पर सख्त सजा हो सकती है। चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती है। एफआईआर हो सकती है और उम्मीदवार को जेल जाना पड़ सकता है  चुनाव के दौरान कोई भी मंत्री सरकारी दौरे को चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। सरकारी संसाधनों का किसी भी तरह चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यहां तक कि कोई भी सत्ताधारी नेता सरकारी वाहनों और भवनों का चुनाव के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता केंद्र सरकार हो या किसी भी प्रदेश की सरकार, न तो कोई घोषणा कर सकती है, न शिलान्यास, न लोकार्पण और ना ही भूमिपूजन। सरकारी खर्च से ऐसा आयोजन नहीं होता, जिससे किसी भी दल विशेष को लाभ पहुंचता हो। इस पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक नियुक्त करता है। उम्मीदवार और पार्टी को जुलूस निकालने या रैली और बैठक करने के लिए चुनाव आयोग से आर्डर लेना होता है और इसकी जानकारी निकटतम थाने में देनी होती है। सभा के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को देना होती है।  कोई भी पार्टी या उम्मीदवार ऐसा काम नहीं कर सकती, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले मत पाने के लिए रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना भारी पड़ सकता है। व्यक्ति टिप्पणियां करने पर भी चुनाव आयोग कार्रवाई कर सकता है। किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार या भूमि का उपयोग नहीं किया जा सकता। मतदान के दिन मतदान केंद्र से सौ मीटर के दायरे में चुनाव प्रचार पर रोक और मतदान से एक दिन पहले किसी भी बैठक पर रोक।
पहले चरण में कुल 91 सीटों पर वोटिंग : आंध्र प्रदेश -24 ,अरुणाचल प्रदेश-2 ,असम-5 ,बिहार-4 ,छत्तीसगढ़-1 ,जम्मू-कश्मीर-2 ,महाराष्ट्र-7 ,मणिपुर-1 ,मेघालय-2 ,मिजोरम-1 ,नागालैंड-1 ,ओडिशा-4 ,सिक्किम-1 ,तेलंगाना-17 ,त्रिपुरा-1 ,यूपी-8 ,उत्तराखंड-5 ,पश्चिम बंगाल-2 ,अंडमान ऐंड निकोबार-1 ,लक्षद्वीप-1 ,दादरा एवं नगर हवेली-1 । 
पहला चरण  11 अप्रैल  : उत्तर प्रदेश-सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, 
बिहार-औरंगाबाद, गया, नवादा, जमुई।
दूसरा चरण 18 अप्रैल : उत्तर प्रदेश -नगीना, अमरोहा, बुलंदशहर, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा, फतेहपुर सीकरी
बिहार- किशनगंज, कटिहार, पुर्णिया, भागलपुर, बांका
तीसरा चरण  23 अप्रैल : उत्तर प्रदेश- मुरादाबाद, रामपुर, संभल, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, आंवला, बरेली, पीलीभीत 
बिहार - झंझारपुर, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, खगड़िया
चौथा चरण 29 अप्रैल : उत्तर प्रदेश- शाहजहांपुर, खीरी, हरदोई, मिश्रिक, उन्नाव, फर्रुखाबाद, इटावा, कन्नौज, कानपुर, अकबरपुर, जालौन, झांसी, हमीरपुर
बिहार- दरभंगा, उजियारपुर, समस्तीपुर, बेगुसराय, मुंगेर
पांचवा चरण  6 मई : उत्तर प्रदेश- धौरहरा, सीतापुर, मोहनलालगंज, लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, बांदा, फतेहपुर, कौसांबी, बाराबंकी, फैजाबाद, बहराइच, कैसरगंज, गोंडा 
बिहार- सीतामढ़ी, मधुबनी, मुजफ़्फ़रपुर, सारण, हाजीपुर

छठा चरण 12 मई : उत्तर प्रदेश- सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फूलपुर, इलाहाबाद, अंबेडकर नगर, श्रावस्ती, डुमरियागंज, बस्ती, संत कबीरनगर, लालगंज, आजमगढ़, जौनपुर, मछलीशहर, भदोही
बिहार- वाल्मिकी नगर, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, वैशाली, गोपालगंज, सिवान, महाराजगंज

सातवां चरण - 19 मई : उत्तर प्रदेश- महराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बांसगांव, घोसी, सलेमपुर, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, राबर्टसगंज।
बिहार- नालंदा, पटना साहिब, पाटिलपुत्रा, आरा, बक्सर, सासाराम, काराकट, जहानाबाद
पंजाब- सभी 13 सीटों गुरदासपुर, अमृतसर, खादूर साहिब, जालंधर, होशियारपुर, आनंदपुर साहिब, लुधियाना, फ़तेहगढ़ साहिब, फ़रीदकोट, फ़िरोजपुर, भटिंडा, संगरुर, पटियाला को अंतिम चरण में 19 मई को वोट डाले जाएंगे। 
 
कुल 20 राज्यों में होगी वोटिंग 
पहले चरण की अधिसूचना जारी होने की तारीख- 18-03-2019 
नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख-24-03-2019 
नामांकन पत्रों की जांच-26 मार्च 
नाम वापस लेने की अंतिम तारीख- 28 मार्च
राज्य में सत्ताधारी दल / गठबंधन: एनडीए जिसमें भाजपा के साथ अपना दल शामिल हैं।
राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या: 80
लोकसभा सीटों पर पार्टी के लिहाज से कब्जा : बीजेपी-71, कांग्रेस -2, सपा-5, अपना दल-2
राज्य में मतदाताओं की संख्या: 13,88,10,557
2014 में मतदान: 58%
कद्दावर नेता: योगी आदित्यनाथ (भाजपा), अखिलेश यादव, मुलायम सिंह(सपा), मायावती (बीएसपी), राहुल गांधी, सोनिया गांधी(कांग्रेस), चौधरी अजीत सिंह, जयंत चौधरी (राष्ट्रीय लोकदल)
मुख्य मुद्दे: सुशासन, विकास, कानून और व्यवस्था, महिला सशक्तीकरण और घरेलू विद्युतीकरण
वाराणसी : क्यों चर्चा में है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट।
पिछले नतीजे: भाजपा यहां 1991 में पहली बार जीती। तब से यहसीट भाजपा के कब्जे में रही है। सिर्फ 2004 में यहां कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्रा जीत सके थे। 2014 में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के बीच यहां मुकाबला था। मोदी के एक बार फिर उनके यहां से लड़ने की संभावना है।
अमेठी : क्यों चर्चा में है गांधी परिवार की परंपरागत सीट, एक बार फिर राहुल और स्मृति आमने-सामने हो सकते हैं।
पिछले नतीजे: 2004 राजनीति में आने के बाद राहुल गांधी इसी सीट से चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। राहुल से पहले उनकी मां सोनिया, पिता राजीव और चाचा संजय यहां से सांसद रह चुके हैं। 1967 में अमेठी लोकसभा सीटअस्तित्व में आई। तब से आज तक कांग्रेस यहां से सिर्फ दो बार 1977 और 1998 में हारी। 1977 में जनता लहर में लोकदल के रवींद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को हराया था। जबकि, 1998 में कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा को भाजपा के संजय सिंह ने मात दी थी।
रायबरेली : क्यों चर्चा में है गांधी परिवार की परंपरागत सीट, सोनिया गांधी कांग्रेस की प्रत्याशी।
पिछले नतीजे: 2004 से सोनिया यहां से जीत रही हैं। सोनिया से पहले इंदिरा भी रायबरेली से तीन बार सांसद रहीं। अमेठी की तरह रायबरेली भी कांग्रेस का गढ़ है। 1952 से 2014 तक हुए 16 चुनावों में कांग्रेस यहां सिर्फ तीन बार हारी। पहली बार 1977 में यहां से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लोकदल के राज नारायण ने हराया था। वहीं, 1996 और 1998 में जब गांधी परिवार कांग्रेस में सक्रिय नहीं था तब भी पार्टी यहां से हार गई थी।
लखनऊ : क्यों चर्चा में है भाजपा की परंपरागत सीट। गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं। दोबारा यहीं से लड़ सकते हैं।
पिछले नतीजे: 1991 से इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 5 बार यहां से सांसद रहे। वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद 2009 में लालजी टंडन भाजपा के टिकट पर यहां से जीते। पिछली बार राजनाथ सिंह यहां से जीतकर संसद पहुंचे।
गोरखपुर : क्यों चर्चा में है उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह क्षेत्र। सीएम बनने से पहले योगी यहां से 6 बार जीते।
पिछले नतीजे: इस सीट पर गोरखनाथ मठ का उम्मीदवार कभी नहीं हारा। योगी से पहले उनके गुरु महंत अवैध नाथ 1989 और 1991 में यहां से सांसद रहे। 1996 से लगातार ये सीट योगी ने जीती। योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा यहां सपा उम्मीदवार प्रवीण निषादसे हार गई। एक बार फिर भाजपा प्रत्याशी मठ के बाहर का हो सकता है। ऐसे में भाजपा के लिए इस सीट को जीतना बड़ी चुनौती होगी।
गुना : क्यों चर्चा में है  सिंधिया परिवार की परंपरागत सीट। पार्टी कोई हो, चुनाव इसी परिवार का सदस्य जीतता है।
पिछले नतीजे: इस सीट पर जब भी सिंधिया परिवार का कोई सदस्य चुनाव में खड़ा हुआ, उसे जीत ही मिली। अब तक के 16 लोकसभा चुनावों में सिर्फ तीन बार 1952, 1962 और 1984 में इस परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ा। राजमाता यशोधरा राजे सिंधिया यहां से 6 बार, माधवराव सिंधिया 4 बार यहां से अलग-अलग दलों के टिकट पर सांसद रहे। 2004 से ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस सांसद हैं। एक बार फिर उनके यहां से लड़ने की बात चल रही है।
छिंदवाड़ा : क्यों चर्चा में है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का गृह क्षेत्र, कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ यहां से चुनाव लड़ सकते हैं।
पिछले नतीजे: आम चुनावों में कांग्रेस यहां कभी नहीं हारी, सिर्फ 1997 में हुए उप-चुनाव में भाजपा के सुंदरलाल पटवा ने कमलनाथ को हराया था। कमलनाथ यहां से 10 बार सांसद चुने गए। 1996 में उनकी पत्नी अलका नाथ सांसद बनी। अब परिवार से तीसरा सदस्य यहां से चुनाव लड़ सकता है।
इंदौर : क्यों चर्चा में है लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन की परंपरागत सीट।
पिछले नतीजे: 1989 से सुमित्रा महाजन यहां से जीत रही हैं। एक बार फिर वे यहां टिकट की दावेदारहैं। 2018 में राज्य में हुए विधासनभा चुनाव में कांग्रेस इस सीट में आने वाली 8 में से तीन सीटों पर जीती थी। ऐसे में इस बार मुकाबला कड़ा हो सकता है।
सवाई-माधोपुर : क्यों चर्चा में है  राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट का क्षेत्र। जयपुर राजघराने की दिया कुमारी भी यहां काफी सक्रिय हैं।
पिछले नतीजे: इस सीट पर कोई भी दल लगातार तीन बार नहीं जीत सका है। 2014 में ये सीट भाजपा के खाते गई थी। इससे पहले 2004 और 2009 में यहां से कांग्रेस जीती। 2018 में राज्य में हुए विधासनभा चुनाव में सवाई-माधोपुर लोकसभा सीट में आने वाली 8 में से 6 सीटें कांग्रेस ने जीतीं।
जयपुर ग्रामीण : क्यों चर्चा में है  केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर यहां से सांसद हैं।
पिछले नतीजे: 2008 के परिसीमन में जयपुर और अलवर जिले के कुछ हिस्सों को मिलाकर जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट का गठन हुआ। परिसीमन के बाद यहां हुए लोकसभा के दो चुनावों में एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा का कब्जा रहा। 2009 में इस सीट पर कांग्रेस के लालचंद कटारिया ने भाजपा के राव राजेंद्र सिंह को 52 हजार 237 वोटों से हराया था। 2014 में भाजपा ने यहां कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ को टिकट दिया। उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी को 3 लाख 32 हजार 896 वोटों से पराजित किया।
जोधपुर : क्यों चर्चा में है राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह क्षेत्र।
पिछले नतीजे: जोधपुर में अशोक गहलोत को छोड़कर कोई भी लगातार तीन बार नहीं जीत सका। गहलोत 1991, 1996 और 1998 में यहां से जीते हैं। 2018 में राज्य में हुए विधासनभा चुनाव में जोधपुर लोकसभा सीट में आने वाली 8 में से 6 सीटें कांग्रेस ने जीतीं।
पटना साहिब : क्यों चर्चा में है शत्रुघ्न सिन्हा यहां से सांसद हैं। भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर भी चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं।
पिछले नतीजे : 2008 में परिसीमन के बाद से यहां दो बार लोकसभा चुनाव हुए और दोनों ही बार शत्रुघ्न सिन्हा ने जीत दर्ज की। उन्होंने 2014 में कांग्रेस नेता और अभिनेता कुणाल सिंह को 2 लाख 65 हजार 805 वोटों के अंतर से हराया था। इससे पहले 2009 में कांग्रेस ने अभिनेता शेखर सुमन को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वे भी शत्रुघ्न से हार गए थे।
दरभंगा : क्यों चर्चा में है भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए कीर्ति आजाद तीन बार यहां से जीत चुके।
पिछले नतीजे : दरभंगा लोकसभा सीट मो. अली अशरफ फातमी का गढ़ रहा है। वे इस सीट से चार बार जीत चुके हैं। कीर्ति आजाद ने 1999 के चुनाव में फातमी को हराकर उनसे यह सीट छीन ली थी। 2004 में फातमी ने फिर इस सीट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2009 और 2014 में कीर्ति आजाद ही इस सीट पर अपना परचम लहराते रहे हैं।
मधेपुरा सीट : क्यों चर्चा में है पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, पप्पू यादव जैसे नेता इस सीट से सांसद रहे।
पिछले नतीजे: आरजेडी से राजेश रंजन (पप्पू यादव) इस सीट से सांसद हैं। उन्होंने 2015 में आरजेडी छोड़कर अपनी जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक का गठन किया। यादव 2004 में भी इस सीट से सांसद रह चुके हैं। मधेपुरा शरद यादव का गढ़ माना जाता है। वे यहां से चार बार (1991, 1996, 1999 और 2009) सासंद रहे। लेकिन 2014 में उन्हें पप्पू यादव ने मात दी। इसके बाद उन्होंने 2016 में लोकतांत्रिक जनता दल बनाया। इस सीट से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी 1998 में लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।
अमृतसर सीट : क्यों चर्चा में है  2014 में अमरिंदर सिंह ने अरुण जेटली को हराया।इस बार चर्चा है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कांग्रेस इस सीट से टिकट दे सकती है।
पिछले नतीजे: भाजपा ने 2014 में लोकसभा चुनाव में नवजोत सिंह सिद्धू का टिकट काटकर अरुण जेटली को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जेटली को 1,02,770 वोट से हराया। हालांकि, अमरिंदर ने 2017 विधानसभा चुनाव के बाद यह सीट छोड़ दी, वे पंजाब के मुख्यमंत्री हैं। उपचुनाव में भी कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला ने जीत दर्ज की। इससे पहले नवजोत सिंह सिद्धू लगातार तीन बार (2004, 2007 उप-चुनाव और 2009) में इस सीट से सांसद रहे। हालांकि, उन्होंने नाराज होकर राज्यसभा सांसद के पद से इस्तीफा दे दिया और 2017 में कांग्रेस से जुड़ गए।
गांधीनगर : क्यों चर्चा में है लालकृष्ण आडवाणी यहां से 6 बार से सांसद हैं।
पिछले नतीजे: गांधीनगर लोकसभा सीट करीब 6 दशक से राजनीति में सक्रिय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का गढ़ माना जाता है। वे यहां से 6 बार (1991, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014) से सांसद हैं। माना जा रहा था कि इस बार भाजपा 75 की उम्र पार कर चुके नेताओं को टिकट नहीं देगी, लेकिन अब पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं को भी टिकट देने का फैसला किया है। ऐसे में आडवाणी एक बार फिर इस सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।
नागपुर : क्यों चर्चा में है यह केंद्रीय मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का निर्वाचन क्षेत्र है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी नागपुर में ही है। 2014 से पहले यह कांग्रेस का गढ़ रहा है। सिर्फ दो बार यहां भाजपा जीत सकी है।
पिछले नतीजे : नागपुर ऐसी लोकसभा सीट है, जो कांग्रेस ने 1977 में इंदिरा विरोधी लहर में भी नहीं गंवाई। 1962 (निर्दलीय) और 1971 (फॉरवर्ड ब्लॉक) छोड़ दें तो 1991 तक हुए बाकी लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस ही जीती। 1996 में यहां से भाजपा के बनवारी लाल पुरोहित जरूर जीते लेकिन 1998, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर विलासराव मुत्तेमवार जीतते रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नितिन गडकरी को टिकट दिया और पार्टी को कांग्रेस के गढ़ में जीत मिली।
रोहतक : क्यों चर्चा में है 9 बार सांसद बन चुके हैं हुड्डा परिवार के सदस्य।
पिछले नतीजे : रोहतक कांग्रेस और हरियाणा के हुड्डा परिवार का गढ़ माना जाता है। यह सीट 9 बार हुड्डा परिवार के पास रही है। आजादी के बाद रणवीर सिंह हुड्डा यहां से लगातार दो बार सांसद रहे। इसके बाद उनके बेटे भूपेंद्र सिंह (1991, 1996, 1999 और 2004) चार बार सासंद रहे हैं। इनके बाद रणवीर के पोते और भूपेंद्र के बेटे दीपेंद्र सिंह ने सीट पर कब्जा जमा लिया। दीपेंद्र (2005 उप-चुनाव, 2009 और 2014) से तीन बार सांसद हैं।
पुरी : क्यों चर्चा में है नरेंद्र मोदी के इस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा।
पिछले नतीजे:पुरी सीट पर 1998 के बाद से बीजद का कब्जा रहा है। इस सीट पर भाजपा कभी जीत हासिल नहीं कर पाई। लेकिन इस बार पुरी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा है। माना जा रहा है कि मोदी अगर यहां से चुनाव लड़ते हैं तो इसका असर राज्य की अन्य सीटों पर भी पड़ा था। ओडिशा उन राज्यों में है जहां 2014 की मोदी लहर का असर नहीं हुआ था। बीजद ने 21 में से 20 और भाजपा ने सिर्फ एक सीट जीती थी। बीजद नेता बृजकिशोर त्रिपाठी यहां से (1991, 1998, 1999, 2004) चार बार सांसद रहे। मौजूदा सांसद पिनाकी मिश्र 1996 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। मिश्र 2009 और 2014 में बीजद से चुनाव जीते।
पत्तनमतिट्टा - सबरीमाला : क्यों चर्चा में है  सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पूरे राज्य में विरोध हुए, भाजपा उन्हीं का फायदा उठाने के प्रयास में।
पिछले नतीजे: केरल का पत्तनमतिट्टा संसदीय क्षेत्र सबरीमाला मंदिर के लिए मशहूर है। सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को मंदिर में हर उम्र की महिला को प्रवेश की अनुमति दी। इसके बाद से ही राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भाजपा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का खुलकर विरोध कर रही है। 2009 में यहां पहली बार लोकसभा चुनाव हुए। इसमें कांग्रेस के एंटोनी पुन्नाथानियिल ने जीत हासिल की। एंटोनी 2014 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर जीते।




V.K Sharma
Editor in Chief
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