मिशन 2019 : दिल्ली में सत्ता हासिल करने के लिए आप और कांग्रेस की भाजपा के खिलाफ वोट काटने की राजनीति शुरू , जानिए क्या है इसके पीछे का सच !
नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड ) आकाश मिश्रा : दिल्ली में आम आदमी
पार्टी और कांग्रेस के बीच वोटकटवा बनाम सीटकटवा की राजनीति शुरू हो गई है. दरअसल
इसकी शुरुआत आप के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस
को दिल्ली में वोटकटवा पार्टी बता कर की. इसके पलटवार के तौर पर दिल्ली कांग्रेस
के अध्यक्ष अजय माकन ने आम आदमी पार्टी को सीटकटवा करार दे दिया. दिलचस्प ये है कि
दोनों पार्टी के नेता तीखी बयानबाजी कर रहे हैं लेकिन बीजेपी के खिलाफ दोनों के
गठबंधन को लेकर भी लगातार कयास लगाए जाते रहे हैं.शनिवार को एक चुनावी सभा में केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में
कांग्रेस को वोट देने का मतलब है बीजेपी की मदद करना क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस
का कोई वजूद नहीं है. इसके जवाब में रविवार को अजय माकन ने एक जनसभा में कहा कि आम
आदमी पार्टी अगर 1-2 सीट जीत भी जाए तो उनका कोई प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार
नहीं है जबकि कांग्रेस दिल्ली में सीट जीतती है तो उससे राहुल गांधी के
प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं बनती हैं. माकन ने तंज कसते हुए कहा कि इस बात की
कौन ज़िम्मेदारी लेगा कि बिहार के नीतीश कुमार की तरह कल को आप सांसद नरेंन्द्र
मोदी को फिर प्रधान मंत्री बनाने में न जुट जाएं क्योंकि आप पार्टी ने ही कहा था 'मोदी फॉर पीएम एंड
केजरीवाल फॉर सीएम'.आपको याद दिला दें कि
पिछली दिल्ली विधानसभा चुनाव के एलान के तत्काल बाद आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर 'मोदी फॉर पीएम एंड
केजरीवाल फॉर सीएम' वाला नारा लिखा गया था. हालांकि चर्चा आने के तुंरत बाद आप
ने ना केवल इस नारे से खुद को किनारा किया बल्कि वेबसाइट से नारे के साथ-साथ नारा
लिखने वाले कार्यकर्ता को भी हटा दिया था.दिल्ली में लोकसभा की सात
सीटें हैं और 2014 में बीजेपी ने सभी सीटें जीती थी. 2009 में सभी सातों सीटें
जीतने वाली कांग्रेस 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही दिल्ली में तीसरे नम्बर की
पार्टी बन गई है. इसके बाद 2014 लोकसभा में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया तो 2015 विधानसभा में आम आदमी
पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीती. 2017 नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने अपना कब्जा बरकरार रखा और
तीनों निगमों में आप विपक्ष में बैठी. हालांकि नगर निगम चुनाव से लेकर दो विधानसभा
उपचुनावों में कांग्रेस का ग्राफ ऊपर गया है.अब नजरें 2019 लोकसभा पर टिकी हैं कि बीजेपी को मुख्य चुनौती आप और
कांग्रेस में से कौन देगा? फिलहाल मुख्य मुकाबला बीजेपी और आप में नजर आ रहा है लेकिन
कांग्रेस को लगता है कि अगर वो पांचों विधानसभा चुनावों खास तौर पर राजस्थान और
मध्यप्रदेश में वो जीत दर्ज करती है और यूपी, बिहार, महाराष्ट्र में उसने
महागठबंधन कर लिया तो फिर दिल्ली में भी बीजेपी के खिलाफ पड़ने वाले वोट उसे ही
मिलेंगे क्योंकि केंद्र सरकार के चुनाव में आप की कोई बिसात ही नहीं है.बहरहाल एक
संभावना ये भी जताई जाती रहती है कि दिल्ली में बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस
और आप साथ आ सकते हैं. लेकिन सीट बंटवारे को लेकर बात बन पाएगी इसकी उम्मीद कम ही है.
आप अगर दिल्ली में कांग्रेस के लिए सीट छोड़ेगी तो पंजाब में वो कांग्रेस से ऐसी ही
उम्मीद करेगी. जहां तक पंजाब का सवाल है तो वहां की कांग्रेस इकाई ने किसी भी
गठबंधन से साफ इंकार कर दिया है. गठबंधन से इंकार दिल्ली में कांग्रेस और आप के
नेता भी करते हैं. लेकिन सूत्रों के मुताबिक दोनों पार्टी का नेतृत्व संपर्क में
है और गठबंधन को लेकर आखिरी फैसला राहुल गांधी को ही करना है.लेकिन दिल्ली में
केजरीवाल और मकान जिस तरह एक दूसरे के खिलाफ तीखी बयानबाजी कर रहे हैं उसके संकेत
तो यही हैं कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो फिर बीजेपी विरोधी 'लहर' को अपने पाले में करने का
माहौल अभी ये बनाया जा रहा है. जहां तक बीजेपी का सवाल है तो उनकी सारी रणनीति 'ब्रांड मोदी' पर निर्भर है. उनके
सांसदों की छवि बहुत लोकप्रिय नहीं है लेकिन आप और कांग्रेस अलग लड़े तो फिर 2014 का नतीजा दुहराया भी जा
सकता है और अगर विपक्ष का गठबंधन हुआ तो फिर खाता खोलने में भी मुश्किल आएगी.
कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को आगामी लोकसभा
चुनाव के मद्देनजर ऑथराइज किए जाने के बाद दिल्ली में गठबंधन की सुगबुगाहट हो रही
है। सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी ने साफ संकेत दे दिए हैं कि केंद्र से बीजेपी
को हटाने के लिए समान सोच वाली पार्टी से हाथ मिलाया जा सकता है। इन दिनों राफेल
डील को लेकर आप नेताओं ने भी बीजेपी और उनके रक्षा मंत्री पर उसी तरह हमले शुरू कर
दिए हैं जैसे कांग्रेस कर रही है, इससे माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में दोनों पार्टियों
के बीच नए सिरे से गठबंधन परवान चढ़ सकता है। अपने पांव पर खडे़ होने की कोशिश कर
रही कांग्रेस सोशल मीडिया पर भी जमीन मजबूत करेगी। इसके लिए जल्द ही बाकायदा
कार्यकारिणी घोषित की जाएगी। सातों लोकसभा क्षेत्रों से लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर तक
की यह कार्यकारिणी एक ओर ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप ग्रुप कांग्रेस के खिलाफ डाली जाने वाली
पोस्ट की काट करेगी, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के पक्ष में माहौल भी बनाएगी। सोशल
मीडिया की टीम इसी माह घोषित कर दी जाएगी। सात लोकसभा अध्यक्ष, 70 विधानसभा अध्यक्ष,
280 ब्लॉक अध्यक्ष एवं हर
बूथ पर भी एक एक अध्यक्ष घोषित किया जाएगा। तय रणनीति के तहत सोशल मीडिया टीम के
सभी अध्यक्ष और कार्यकर्ता ऐसी हर पोस्ट पर निगाह रखेंगे जोकि कांग्रेस के खिलाफ
हो। उस पोस्ट का सोशल मीडिया के ही जरिये प्रतिवाद किया जाएगा। जनता के सामने उसकी
सच्चाई रखी जाएगी। इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया पर आए दिन कुछ ऐसी पोस्ट डाली जाएंगी
जो कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करेंगी। दिल्ली में कांग्रेस के 15 साल लंबे कार्यकाल की
उपलब्धि परक पोस्ट डाली जाएंगी, आम आदमी पार्टी और भाजपा के चुनावी वादों की कलई खोलने वाली
और उनके हर झूठ को सामने लाने वाली पोस्ट भी डाली जाएंगी। विभिन्न वाट्सएप ग्रुप
के जरिये पार्टी के हर संदेश को भी चुटकियों में प्रदेश से लेकर बूथ स्तर तक
फैलाया जाएगा। साथ ही यह टीम सोशल मीडिया पर उस संघर्ष को सामने लाएगी जो पार्टी
फिलहाल सत्ता से बाहर रहते हुए कर रही है। मसलन, सीलिंग के खिलाफ चल रहा
न्याययुद्ध। जनता के सामने विभिन्न राष्ट्रीय एवं स्थानीय मुद्दे भी रखे जाएंगे।
अनिरुद्ध शर्मा, (अध्यक्ष, आइटी प्रकोष्ठ, प्रदेश कांग्रेस) का कहना है कि सोशल मीडिया पर सक्रियता आज
राजनीति का अनिवार्य अंग बन गई है। बहुत जल्द प्रदेश कांग्रेस भी इस दिशा में
पूर्णतया सक्रिय नजर आएगी। खास बात यह कि हम औरों की तरह अभद्र पोस्ट नहीं
डालेंगे।पिछले दिनों दिल्ली में लोकसभा
चुनाव को लेकर कांग्रेस और आप के बीच में गठबंधन के कयास लगाए जा रहे थे, जिसे कांग्रेस के लोकल
लीडरशिप ने खारिज कर दिया था और आप ने चुप्पी साध ली थी। लेकिन अब एक बार फिर से
गठबंधन की बात उठने लगी है क्योंकि कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में जिस प्रकार
आगामी गठबंधन पर फोकस किया गया, उससे यह साफ हो रहा है कि आने वाले कुछ दिनों में दिल्ली
में भी इसका पॉजिटिव असर दिखे। जहां तक लोकल लीडरशिप की बात है तो इस बारे में
कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने कहा कि कर्नाटक चुनाव में भी वहां की लोकल लीडरशिप
गठबंधन नहीं चाहती थी, किंतु गठबंधन वहां की जरूरत थी इसलिए उनके नहीं चाहते हुए
भी गठबंधन किया गया। सूत्रों का कहना है कि ऐसी सूरत में लोकल लीडरशिप साइड कर दी
जाती है। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि पिछले कुछ दिनों से दोनों पार्टी इस पर चुप
हैं, लेकिन एक दूसरे के खिलाफ
आरोप प्रत्यारोप भी कम हुआ है। वहीं दूसरी ओर केंद्र के खिलाफ दोनों का हमला एक
तरह से है जो यह दर्शा रहा है कि आने वाले दिनों में दोनों पार्टी एक रास्ते पर
चलने का फैसला करें। कांग्रेस सूत्रों का साफ कहना है कि राष्ट्रीय कांग्रेस का एक
मात्र मकसद मोदी सरकार को बेदखल करना है और वह इसके लिए हर ऐसा प्रयास करने को
तैयार है, जिससे उन्हें दम मिल सके
और उनकी दावेदारी मजबूत हो। यह भी माना जा रहा है कि अगर गठबंधन नहीं होता है कि
और दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबला होता है तो बीजेपी की राह आसान हो जाएगी क्योंकि
पिछले चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ पहले से बेहतर हुआ और आप का वोट प्रतिशत कम हुआ
है और बीजेपी के वोट पहले जितना ही कायम हैं, जिससे त्रिकोणीय मुकाबला
बीजेपी के फेवर में जा सकता है। ऐसी स्थिति में गठबंधन ही एक बेहतर विकल्प माना जा
रहा है।