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न्यूज़ ग्राउंड विशेष
By   V.K Sharma 03/10/2018 :15:05
क्या है राफेल सौदा और क्या है इससे जुड़ा विवाद, वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने गिनाईं राफेल की खूबियां !
 

 

 

नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड) आकाश मिश्रा : भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर कांग्रेस केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी को एक इंटरव्यू के जरिए जवाब भी दिया। लेकिन, विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। रही सही कसर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद के एक कथित बयान ने पूरी कर दी। इसमें उन्हें यह कहते हुए बताया गया है कि रिलायंस का नाम भारत ने प्रस्तावित किया था। दरअसल, करार की शर्तों को गोपनीय रखा गया है। इसलिए, भारत और फ्रांस दोनों ही इसकी कीमत भी नहीं बता रहे। कांग्रेस और राहुल गांधी इसी वजह से सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। बहरहाल, हम यहां आपको इस डील और उससे जुड़े कुछ सवालों के जवाब दे रहे हैं। राजधानी दिल्ली में बुधवार को एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान राफेल की खासियत पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि राफेल अच्छा विमान है और जब यह उपमहाद्वीप में आएगा तो अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा। साथ ही, वायुसेना प्रमुख धनोआ ने इसे गेम चेंजर बताया है। धनोआ से जब यह पूछा गया कि क्या भारतीय वायुसेना को इस बात की सूचना दी गई थी कि राफेल सौदे में खरीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से बदलकर 36 की जा रही है। इसके जवाब में धनोआ ने कहा, 'सौदे को लेकर उचित स्तर पर वायुसेना से परामर्श किया गया था। वायुसेना ने कुछ विकल्प दिए थे। उनमें से चुनाव करना सरकार का काम है।' आगे उन्होंने कहा कि हमें (भारत) अच्छा पैकेज मिला है, राफेल सौदे में कई फायदे हैं। इस बीच उन्होंने सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि यह सरकार द्वारा उठाया गया साहसिक कदम है और जिसने 36 राफेल विमान खरीदने का करार किया। एक उच्च प्रदर्शन, हाई-टेक तकनीक की क्षमता को ऑफसेट करने वाला विमान वायु सेना को दिया जाएगा।' इस बीच, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ राफेल विमान का सौदा न होने पर भी वायुसेना प्रमुख ने टिप्पणी की। यह डील उस मीडियम मल्टी -रोल कॉम्बेयट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे रक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) लाइट कॉम्बेकट एयरक्राफ्ट और सुखोई के बीच मौजूद अंतर को खत्मह करने के मकसद से शुरू किया गया था. मीडिया खबरों के अकनुसार एमएमआरसीए के कॉम्पिटीशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्टी राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्क न, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे. छह फाइटर जेट्स के बीच राफेल को इसलिए चुना गया क्योंकि राफेल की कीमत बाकी जेट्स की तुलना में काफी कम थी. इसके अलावा इसका रख-रखाव भी काफी सस्ताल था. उन्होंने बताया कि HAL के साथ रहने पर विमान की डिलीवरी में देरी हो रही थी। धनोआ ने बताया कि एचएएल द्वारा सुखोई-30 की डिलिवरी में तीन साल, जगुआर की डिलिवरी में छह साल, एलसीए की डिलिवरी में पांच साल की देरी है, जबकि मिराज 2000 अपग्रेड की डिलिवरी में 2 साल की देरी है। बता दें कि विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने राफेल डील में घोटाला होने का आरोप लगाया है। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार राफेल विमान की खरीद 1,670 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर पर कर रही है, जबकि एनडीए सरकार ने दावा किया कि यह सौदा उसने यूपीए से ज्यादा बेहतर कीमत में किया है और करीब 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं. लेकिन 36 विमानों के लिए हुए सौदे की लागत का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया. सरकार का दावा है कि पहले भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की कोई बात नहीं थी, सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी की लाइसेंस देने की बात थी. लेकिन मौजूदा समझौते में 'मेक इन इंडिया' पहल किया गया है. फ्रांसीसी कंपनी भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगी. लेकिन मीडिया में आई तमाम खबरों में यह दावा किया गया कि यह पूरा सौदा 7.8 अरब रुपये यानी 58,000 करोड़ रुपये का हुआ है और इसकी 15 फीसदी लागत एडवांस में दी जा रही है. भारत को इसके साथ स्पेयर पार्ट और मेटोर मिसाइल जैसे हथियार भी मिलेंगे जिन्हें कि काफी उन्नत माना जाता है. बताया जाता है कि यह मिसाइल 100 किमी दूर स्थित दुश्मन के विमान को भी मार गिरा सकती है. अभी चीन या पाकिस्तान किसी के पास भी इतना उन्नत विमान सिस्टम नहीं है. विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर सरकार ने हजारों करोड़ रुपए बचा लिए हैं तो उसे आंकड़े सार्वजनिक करने में क्या दिक्कत है. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यूपीए 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये दे रही थी, जबकि मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ दे रही है. कांग्रेस का आरोप है कि एक प्लेन की कीमत 1555 करोड़ रुपये हैं, जबकि कांग्रेस 428 करोड़ में रुपये में खरीद रही थी. कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी सरकार के सौदे में 'मेक इन इंडिया' का कोई प्रावधान नहीं है. यूपीए सरकार के दौरान इस पर समझौता नहीं हो पाया, क्योंकि खासकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध बन गया था. दसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले 108 विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी. दसाल्ट का कहना था कि भारत में विमानों के उत्पादन के लिए 3 करोड़ मानव घंटों की जरूरत होगी, लेकिन एचएएल ने इसके तीन गुना ज्यादा मानव घंटों की जरूरत बताई, जिसके कारण लागत कई गुना बढ़ जानी थी. साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसने इस दिशा में फिर से प्रयास शुरू किया. पीएम की फ्रांस यात्रा के दौरान साल 2015 में भारत और फ्रांस के बीच इस विमान की खरीद को लेकर समझौता किया. इस समझौते में भारत ने जल्द से जल्द 36 राफेल विमान फ्लाइ-अवे यानी उड़ान के लिए तैयार विमान हासिल करने की बात कही. समझौते के अनुसार दोनों देश विमानों की आपूर्ति की शर्तों के लिए एक अंतर-सरकारी समझौता करने को सहमत हुए. समझौते के अनुसार विमानों की आपूर्ति भारतीय वायु सेना की जरूरतों के मुताबिक उसके द्वारा तय समय सीमा के भीतर होनी थी और विमान के साथ जुड़े तमाम सिस्टम और हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना द्वारा तय मानकों के अनुरूप होनी है. इसमें कहा गया कि लंबे समय तक विमानों के रखरखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की होगी. सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ. समझौते पर दस्तखत होने के करीब 18 महीने के भीतर विमानों की आपूर्ति शुरू करने की बात है यानी 18 महीने के बाद भारत में फ्रांस की तरफ से पहला राफेल लड़ाकू विमान दिया जाएगा विरोधि‍यों का कहना है कि यूपीए सरकार 18 बिल्कुल तैयार विमान खरीदने वाली थी और बाकी 108 विमानों का भारत में एसेंबलिंग की जानी थी. इसके अलावा इस सौदे में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की बात कही गई थी, ताकि खुद बाद में भारत में इन विमानों को बनाया जा सके. कांग्रेस का कहना है कि जब यूपीए सरकार सस्ते, बेहतर और व्यापक सौदे पर बात कर रही थी, तो इस सौदे को करने की एनडीए सरकार को इतनी हड़बड़ी क्यों थी. सौदे के आलोचकों का कहना है कि यूपीए के सौदे में विमानों के भारत में एसेंबलिंग में सार्वजनिक कंपनी हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को शामिल करने की बात थी. भारत में यही एक कंपनी है जो सैन्य विमान बनाती है. लेकिन एनडीए के सौदे में एचएएल को बाहर कर इस काम को एक निजी कंपनी को सौंपने की बात कही गई है. किसी भरोसेमंद सरकारी कंपनी की जगह अनाड़ी नई निजी कंपनी को शामिल करना कैसे उचित हो सकता है. यानी विरोधि‍यों के मुताबिक एनडीए सरकार एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचा रही है. कांग्रेस का आरोप है कि सौदे से HAL को 25000 करोड़ रुपये का घाटा होगा.

 

 

 



V.K Sharma
Editor in Chief
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