Mahashivratri 2019 : महाशिवरात्रि पर बना अद्भुत संयोग, जानिए क्या है शुभ मुर्हूत्त, पूजन विधि और पौराणिक कथाएँ !
नई दिल्ली(न्यूज़ ग्राउंड) आकाश मिश्रा : महाशिवरात्रि भगवान शिव का सबसे बड़ा पर्व है. इसी वजह से कोई भी भक्त किसी भी तरह भोलेनाथ की सेवा में कमी नहीं छोड़ना चाहता. शिव शंकर को खुश करने के लिए अपनी पूजा-अर्चना से लेकर पवित्र नदियों में स्नान तक, सबकुछ करता है. लेकिन जिन भक्तों के पास वक्त की कमी होती है, वो हर बार निराश हो जाते हैं. क्योंकि वह अपने शिव की विधिवत पूजा नहीं कर पाते. अगर आप भी ऐसे ही भक्तों की लिस्ट में शामिल हैं जिनके पास अपने काम के चलने घंटों की पूजा करने का वक्त नहीं, तो आप यहां दी गई महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की पूजा की आसान और मिनटों में की जाने वाली पूजा-विधि देखें फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया है। इस बार यह महाशिवरात्रि 4 मार्च दिन सोमवार को है। चंद्र चक्र में आने वाली सबसे अंधेरी रात को शिवरात्रि कहते हैं। महाशिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन की रात है। इस रात में आध्यात्मिक शक्तियां जागृत होती हैं इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि इस रात का प्रयोग ध्यान, तप और शिव साधना में करना चाहिए। महाशिवरात्रि में शिव साधना करने से जीवन में सभी प्रकार के तनाव खत्म होते हैं और सकारात्मक प्रमाण दिखने लगते हैं। आइए जानते हैं साधना करने से जीवन में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। महाशिवरात्रि परम कल्याणकारी व्रत है जिसके विधिपूर्वक करने से व्यक्ति के दुःख, पीड़ाओं का अंत होता है और उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है। पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन, सौभाग्य, समृद्धि व आरोग्यता प्राप्त होती है। पूजन करने वाला मोक्ष को प्राप्त करने के योग्य बन जाता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि के रात मानव शरीर में ऊर्जा सहज ही ऊपर की ओर चढ़ती है। शिव साधना के लिए महाशिवरात्रि की रात के लिए खुद को तैयार करने के लिए है। कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र आठ साल से ज्यादा है, यह साधना कर सकता है। सांगीपुर, प्रतापगढ़,उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध आचार्य पं. राम लखन मिश्रा जी ने कहा कि इस बार महाशिवरात्रि सोमवार को पड़ने से अत्यंत शुभ मानी जा रही है। सोमवार शिव जी का ही दिन होता है और उस दिन की महाशिवरात्रि अत्यंत शुभ संकेत लेकर आ रही है। शिवजी का मूल मंत्र जो संस्कृत के 5 शब्दों से मिलकर बना है, सब मंत्रों में शुभ व पवित्र माना जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्तियों को शिव-मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से अनेक प्रकार की सात्विक और पवित्र ऊर्जा का शरीर में समावेश होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव तो मात्र बेल पत्र चढ़ाने से भी खुश होकर अपने भक्तों की मुराद पूरी करते हैं। यहां हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही चीजों के बारे में जिन्हें भगवान शिव को अर्पित कर आप उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। इस बार महाशिवरात्रि पर दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस साल महाशिवरात्रि सोमवार को है। सोमवार का स्वामी चन्द्रमा है। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को सोम कहा गया है। सोमवार को महाशिवरात्रि का होना बहुत ही शुभ माना गया है। सोमवार को शिवजी की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को अर्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए। इस वर्ष चार मार्च सोमवार को दिन में शाम 4.35 मिनट से चतुर्दशी लग रही है। जो मंगलवार पांच मार्च को शाम 6.40 मिनट तक रहेगी। अर्धरात्रिव्यापिनी ग्रह होने से चार मार्च को ही महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। सोमवार महाशिवरात्रि पर सूर्य चंद्रमा शिव योग बना रहे हैं। ये योग सोमवार को दोपहर 1.43 मिनट से शुरू हो रहा है। सालभर में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है। साल में आने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। सनातन हिंदू धर्म में दिन-रात मिलाकर चौबीस घंटे में आठ पहर होते हैं। औसतन एक पहर तीन घंटे का होता है। इसमें से चार पहर दिन और चार रात के होते हैं। इस स्थिति में सूर्यास्त के बाद चतुर्दशी तिथि के योग में चार पहर की पूजा चार मार्च को की जाएगी। यह महासंयोग अद्भुत होने के साथ ही मंगलकारी माना जा रहा है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था। भगवान शिव के विवाह में सिर्फ देव ही नहीं दानव, किन्नर, गंधर्व, भूत, पिशाच भी इस विवाह में शामिल हुए थे। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग को गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान करवाया जाता है। फिर चंदन लगाकर फल-फूल, बेलपत्र, धतूरा, बेर इत्यादि अर्पित किए जाते हैं। शास्त्रानुसार निशिथ व्यापिनी और चतुर्दशी युक्त महाशिवरात्रि को ग्राह्य बताया गया है। इस दिन भगवान शिव की आराधना कई गुना अधिक फल देती है। इस दिन व्रत रखकर भक्त शिव की आराधना करने से विशेष पुण्य और लाभ कि प्राप्ति होगी। फाल्गुन मास के दिन आने वाली महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और पार्वती का शुभ विवाह हुआ था। इसलिए इस त्योहार को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता हैं।
महादेव की पूजा में उपयोग किए जाने वाली सामग्री ,मिलेगा मनचाहा वरदान
1. चंदन को बेहद पवित्र माना गया है। कहा जाता है इसे लगाने से दिमाग शांत रहता है। भगवान शिव को भी चंदन बेहद प्रिय हैं इसलिए भोले शंकर को चंदन का तिलक करना चाहिए।
2. अगरू: भगवान शिव की पूजा में अगरू एक विशेष महत्व रखती है। इसे भगवान को अर्पित करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।
3. धतूरा और बेल पत्र: भगवान शिव को बेल पत्र और धतूरा बहुत पसंद हैं। सोमवार और शिवरात्रि पर इन्हें चढ़ाने से भगवान अपने भक्त की हर मुराद पूरी करते हैं।
4. इत्र : भोले शंकर को प्रसन्न करने के लिए इत्र भी चढ़ाया जाता है। इत्र भी भोले शंकर को बहुत पसंद है।
5. भस्म : बेल पत्र के बने भस्म से पूजन, अभिषेक और आरती करने पर भोलेनाथ अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं।
6. इस महाशिवरात्रि पर पुत्र प्राप्ति योग भी बन रहा है। रुद्रभिषेक करने पर भगवान शिव आह्लादित खुशहोंगे।
महाशिवरात्रि 2019 शिवलिंग अभिषेक एवं पूजन का शुभ मुहूर्त
शुभ मुहूर्त शुरू - शाम 04:28, 4 मार्च 2019
शुभ मुहूर्त समाप्त - 07:07, 5 मार्च 2019
महाशिवरात्रि व्रत नियम
1 सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके भगवान शिव की विधिवत पूजा करें।
2. दिन में फलाहार, चाय, पानी आदि का सेवन करें।
3. शाम के समय भगवान शिव की पूजा अर्चना करें।
4. रात के समय सेंधा नमक के साथ बनें व्रत में खाए जाने वाला भोजन खाएं।
5. कुछ लोग शिवरात्रि के दिन सिर्फ मीठा ही खाते हैं।
इस प्राचीन मंत्र शिव पंचाक्षरी का करे जाप !
नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय भास्मंगारागाय महेश्वराय
नित्याय शुद्धाय दिगम्बरायतस्मै 'न'काराय नमः शिवाय ।।1।।
महाशिवरात्रि पर राशि अनुसार शिव पूजा करते समय इम मंत्रों का जाप करें-
मेष- मेष राशि वाले मंत्र ॐ गंगाधराये नमः का जाप करें.
वृषभ- इस राशि के लोग मंत्र ॐ सोमनाथाय नमः का जाप करें.
मिथुन- मिथुन राशि के लोग मंत्र ॐ नागेश्वराय नमः का जाप करें.
कर्क- कर्क राशिन वाले मंत्र ॐ रामेश्वराय नमः का जाप करें.
सिंह- सिंह राशि के लोग मंत्र ॐ नन्देश्वराये नमः का जाप करें.
कन्या- इस राशि वाले मन्त्र ॐ ओंकाराये नमः का जाप करें.
तुला- तुला राशि वाले मंत्र ॐ हर हर महादेवाय नमः का जाप करें.
वृश्चिक- इस राशि के लोग मंत्र ॐ नमो भगवते रुद्राय का जाप करें.
धनु- धनु राशि के लोग ॐ पार्वतीपतिये नमः मंत्र का जाप करें.
मकर- मकर रााशि वाले ॐ ओंकाराये नमः मंत्र का जाप करें.
कुंभ- कुंभ राशि के लोग ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें.
मीन- मीन राशि वाले मंत्र ॐ कैलाशपतिये नमः का जाप करें.
न करें इन चीजों का सेवन : मान्यता है जो लोग व्रत रहते है उन्हें शिवरात्रि के दिन पर चावल, दाल और गेहूं से बने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। ये भी कहा जाता है कि जो लोग शिवजी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं उन्हें फल, दूध, चाय, कॉफी आदि का भी सेवन करना चाहिए।
करें इन चीजों का सेवन : अगर आप बिना कुछ खाएं दिनभर भूखे नहीं रह सकते है तो आप कुट्टू का आटा और सेंधा नमक, आलू, साबुदाना, आलू की सब्जी और साबुदाने से बनी व्यंजन खा सकते है।
शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर : साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आने वाली शिवरात्रि को सिर्फ शिवरात्रि कहा जाता है लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन आने वाले शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे कुछ लोग सबसे बड़ी शिवरात्रि के नाम से भी जानते हैं।
महाशिवरात्रि की शिकारी कथा : एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को सबसे सरल व्रत-पूजन का उदाहरण देते हुए एक शिकारी की कथा सुनाई. इस कथा के अनुसार चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, वो पशुओं की हत्या कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था. उस पर एक साहूकार का ऋण था, जिसे समय पर ना चुकाने की वजह से एक दिन साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया था. संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी. शिवमठ में शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और कथा सनाई जा रही थी, जिसे वो बंदी शिकारी भी सुन रहा था. शाम होते ही वो साहूकार शिकारी के पास आया और ऋण चुकाने की बात करने लगा. इस पर शिकारी ने साहूकार से कर्ज चुकाने की बात कही. अगले दिन शिकारी फिर शिकार पर निकला. इस बीच उसे बेल का पेड़ दिखा. रात से भूखा शिकारी बेल पत्थर तोड़ने का रास्ता बनाने लगा. इस दौरान उसे मालूम नहीं था कि पेड़ के नीचे शिवलिंग बना हुआ है जो बेल के पत्थरों से ढका हुआ था. शिकार के लिए बैठने की जगह बनाने के लिए वो टहनियां तोड़ने लगा, जो संयोगवश शिवलिंग पर जा गिरीं. इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए. इस दौरान उस पेड़ के पास से एक-एक कर तीन मृगी (हिरणी) गुज़रीं. पहली गर्भ से थी, जिसने शिकारी से कहा जैसे ही वह प्रसव करेगी खुद ही उसके समक्ष आ जाएगी. अभी मारकर वो एक नहीं बल्कि दो जानें लेगा. शिकारी मान गया. इसी तरह दूसरी मृग ने भी कहा कि वो अपने प्रिय को खोज रही है. जैसे ही उसके उसका प्रिय मिल जाएगा वो खुद ही शिकारी के पास आ जाएगी. इसी तरह तीसरी मृग भी अपने बच्चों के साथ जंगलों में आई. उसने भी शिकारी से उसे ना मारने को कहा. वो बोली कि अपने बच्चों को इनके पिता के पास छोड़कर वो वापस शिकारी के पास आ जाएगी. इस तरह तीनों मृगी पर शिकारी को दया आई और उन्हें छोड़ दिया, लेकिन शिकारी को अपने बच्चों की याद आई कि वो भी उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं. तब उसके फैसला किया वो इस बार वो किसी पर दया नही करेगा. इस बार उसे मृग दिखा. जैसे ही शिकारी ने धनुष की प्रत्यंचा खींची मृग बोला - यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों और छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े. मैं उन मृगियों का पति हूं. यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो. मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा. ये सब सुन शिकारी ने अपना धनुष छोड़ा और पूरी कहानी मृग को सनाई. पूरे दिन से भूखा, रात की शिव कथा और शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ाने के बाद शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया. उसमें भगवद् शक्ति का वास हुआ. थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके. लेकिन जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई. शिकारी ने मृग के परिवार को न मारकर अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया. देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे. इस घटना के बाद शिकारी और पूरे मृग परिवार को मोक्ष की प्राप्ति हुई.
महाशिवरात्रि की कालकूल कथा : अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ. लेकिन इस अमृत से पहले कालकूट नाम का विष भी सागर से निकला. ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट किया जा सकता था. लेकिन इसे सिर्फ भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे. तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था. इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया. इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा. मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है.