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संपादक
By   V.K Sharma 01/09/2018 :12:50
कृषि शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव, युवाओं को आकर्षित करने के लिए मोदी सरकार की क्या है नायब तरकीब !
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के निर्देशन में गत वर्षों में कृषि और किसानों की बेहतरी के लिए जो सतत प्रयास किये गये हैं, उनके उत्साहजनक व सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं. मोदी सरकार किसानों के कल्याण के लिए जिस मनोयोग से जुटी है, इससे किसानों के जीवन में गुणात्मक सुधार आ रहा है. मोदी सरकार ने विकास के लिए देश के सामने नयी कार्यविधि, पारदर्शी कार्यशैली के नये प्रतिमान रचे हैं. सरकार ने समयबद्ध तरीके से मोदीजी के कुशल मार्गदर्शन में किसान कल्याण की योजनाओं के पूर्ण क्रियान्वयन के लक्ष्यों को मिशन मोड में परिवर्तित किया है. सुशासन के नये आयामों, नवाचारों एवं सुधारवादी दृष्टिकोण से एक आधुनिक और भविष्योन्मुख भारत की नींव सरकार ने रखी है. मोदी सरकार किसानों में कृषि उन्नति के लिए की गयी नयी पहलों के प्रति जागरूकता लाने में सफल हुई है. कृषि क्षेत्र में युवाओं को लुभाने के लिए सरकार जल्दी ही एक नायाब योजना शुरु करने जा रही है, जो 'अभ्यास' नाम से जानी जाएगी। देश में फिलहाल पांच फीसद युवा ही कृषि को अपनाते हैं। ग्रामीण युवाओं के पास रोजगार का कोई और विकल्प न होने की वजह से मजबूरी में ही कृषि क्षेत्र में उतरते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉक्टर त्रिलोचन मोहपात्रा ने कहा कि यह एक गंभीर चुनौती है, जिससे निपटने के लिए सरकार ने इस दिशा में कारगर पहल की है। राष्ट्रीय किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त बृहस्पतिवार को यहां 'कृषि क्षेत्र में युवाओं को आकर्षित व प्रेरित करने' पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अभ्यास योजना के तहत विज्ञान विषय के स्नातक छात्रों को कृषि क्षेत्र में काम करने के लिए छह महीने का मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण के बाद इन युवाओं को एग्री क्लीनिक, स्वायल टेस्टिंग लैब और अन्य इसी तरह के किसानों के हित से जुड़े उद्यम शुरु करने का मौका दिया जाएगा। इसके लिए उन्हें रियायती दरों पर बैंकों से ऋण दिया जाएगा। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सिर्फ पांच फीसद युवा ही लगे हैं। खेती में लगने वाले इन युवाओं के पास कोई और विकल्प न होने की वजह से उन्हें खेती से जुड़ना पड़ा है। कृषि क्षेत्र के लिए यह अत्यंत गंभीर चुनौती है। इसीलिए खेती को आकर्षक क्षेत्र बनाने के लिए सरकार प्रयास कर रही है। अभ्यास योजना के बाबत अलग निधि का गठन किया जाएगा। सम्मेलन में हिस्सा ले रहे राष्ट्रीय किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त ने कहा कि खेती के प्रति युवाओं को आकर्षित करने के लिए इसे 'प्रेस्टिज के साथ प्राफिट' का क्षेत्र बनाना होगा। मान सम्मान के साथ फायदे वाला उद्यम बनाने पर ही युवा इसकी ओर बढ़ेंगे।सरकार ने युवा को बढ़ावा देने के लिए अपने बजट में से कृषि को 52% हिस्सा दिया है  सम्मेलन के संयोजक ने युवाओं को कृषि क्षेत्र युवाओं को उद्यमी के तौर पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इस समय किसानों को उनके खेत पर ही सुविधाएं देने की जरूरत है, जिसे युवा वैज्ञानिक ही देने में सक्षम है। कृषि क्षेत्र को मल्टी सुपर स्पेसियलिटी अस्पताल जैसी सहूलियत की जरूरत है। दो दिवसीय सम्मेलन में दो सौ से अधिक युवा वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। इसमें विभिन्न राज्यों से रिसर्च स्कॉलर हिस्सा ले रहे हैं। राष्ट्रीय किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त ने तत्कालीन सरकार से अनुशंसा कृषि आधारित सोच के साथ किसानों के कल्याण पर भी उचित ध्यान दिया जाना चाहिए. कमीशन ने विज्ञान आधारित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन एवं सतत उत्पादन व विकास की तरफ भी ध्यान देने की बात कही थी. पिछले चार वर्षों में कृषि क्षेत्र में सतत विकास करने, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने तथा कृषि उत्पादन लागत में कमी करने के लिए बहुत सारे प्रयास किये गये हैं. इन प्रयासों से हमारे जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं. देशव्यापी सॉएल हेल्थ कार्ड स्थापित करना इसी सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. नाइट्रोजन उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने कृषि में केवल नीम कोटिड यूरिया के उपयोग को अनिवार्य बनाया है. इससे उत्पादकता सुधरी है और कृषि लागत घटी है. कृषि विकास एवं मृदा स्वास्थ्य हेतु ऑर्गेनिक खेती को परंपरागत विकास योजना के साथ जोड़ दिया गया है. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लागू होने से कृषि कार्यों में उचित जल प्रबंधन हो सकेगा. सरकार ने विश्व की सबसे बड़ी किसान अनुकूल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा मौसम आधारित फसल बीमा योजना 2016 में शुरू की, जिसके तहत कृषि क्षेत्र को जोखिमों से सुरक्षा दी गयी है. मॉडल एग्रीकल्चरल लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 में राज्यों को जारी किया, जो कृषि सुधारों के संदर्भ में अत्यंत ही महत्वपूर्ण कदम है. राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक ई-मार्केट स्कीम 2016 (ई-नाम) एक ऐसा एकीकृत उपाय है, जो देश के कृषि बाजारों को एक साथ जोड़ता है. सरकार ने देश की 585 कृषि उत्पाद समितियों के अलावा भी मंडियों के बीच खुले व्यापार पर ध्यान देकर राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना की है. वर्ष 2018 के बजट में, नयी बाजार संरचना के बारे में बहुत सारी बातें कही गयी हैं. छोटे एवं सीमांत किसान, अपनी छोटी सी उपज को नजदीकी बाजार में बेच सकें, इसके लिए भी व्यवस्था की गयी है. 22,000 ग्रामीण बाजारों का देशभर में फैलाव, ग्रामीण कृषि मार्केट के विकास के अंतराल को कम करता है. नया आधारभूत ढांचा, छोटे एवं सीमांत किसान, एपीएमसी या ई-नाम से जुड़कर अपनी छोटी-छोटी उपज को भी प्रभावशाली ढंग से बेच सकेंगे. हम और एक मजबूत एवं सक्षम कृषि बाजार के उचित न्यायिक ढांचे का विकास हासिल कर सकें, इस हेतु मोदी सरकार ने मॉडल (कृषि उत्पाद एवं पशुधन विपणन अधिनियम 2016) बनाकर सभी प्रदेशों को दे दिया गया है तथा कृषि उत्पाद तथा पशुधन कांट्रैक्ट फार्मिंग एवं सेवा नियमावली 2018 भी राज्यों को लागू करने हेतु दिया गया है. लागत से न्यूनतम 52  प्रतिशत ज्यादा समर्थन मूल्य देने का निर्णय लेकर सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया, ताकि किसान-हितों की भरपाई हो सके. सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लागू करने के लिए भी प्रतिबद्ध है. हरित क्रांति की शुरुआत से ही सरकारी खरीद केवल धान और गेहूं तक सीमित रही है. एमएसपी पर इन फसलों की सुनिश्चित खरीद से, किसानों तथा इस सेक्टर, जो अभी तक उपेक्षित थे, को दरों में महत्वपूर्ण वृद्धि मिलेगी. मोदी सरकार आने के बाद दलहन एवं तेलहन खरीद में भारी वृद्धि हुई है. प्रधानमंत्री जी का आजादी के 75वें वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य से एक बड़े उद्देश्य की पूर्ति होगी.   पशुपालन, मछली पालन, जलजीवों के विकास को भी सरकार ने अपनी नीतियों एवं योजनाओं में प्राथमिकता दी है. राष्ट्रीय गोकुल मिशन से बहुत सारे लघु एवं सीमांत किसान, भूमिहीन कृषि मजदूर और जो देशी नस्लें पालते हैं, सबको उचित लाभ मिल रहा है. मछली उत्पादन क्षेत्र ने कृषि के सभी क्षेत्रों से ज्यादा वृद्धि दर हासिल की है. गरीब किसानों के लिए सहयोगी कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार की कृषि आधारित सहयोगी योजनाओं से कृषि जगत में अतिरिक्त रोजगार एवं आमदनी पैदा करने में सहायता मिलेगी. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा पिछले चार साल में फसलों की कुल 795 उन्नत किस्में विकसित की गयी हैं, जिसमें 495किस्में जलवायु के विभिन्न दबावों के प्रति सहिष्णु हैं. सीमांत एवं लघु किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में पहल करते हुए कुल 45 एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल विकसित किये गये. भारत सरकार द्वारा इनको गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र में इस मॉडल को स्थापित किया जा रहा है, ताकि किसान इसे अपनाकर अधिक लाभ कमा सकें. कृषि में नीतिगत सुधारों एवं नयी-नयी योजनाओं को सरकार द्वारा लागू करने के लिए आवश्यकतानुसार बजट की व्यवस्था की गयी है. पिछले वर्षों में मोदी सरकार ने ऐसी योजनाओं के लिए 2,11,694 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है. सरकार ने डेयरी, को-ऑपरेटिव, मछली तथा जलजीवों के उत्पादन, पशुपालन, कृषि बाजार एवं सूक्ष्म सिंचाई के आधारभूत ढांचे एवं व्यवस्था में सुधार हेतु सक्षम कार्पस फंड बनाये हैं. इस प्रकार से सरकार ने कृषि जगत एवं किसानों के कल्याण हेतु तथा उपभोक्ताओं की अभिरुचि को ध्यान में रखकर सतत उत्पादन की तरफ आय केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है. देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की समग्र भलाई व कल्याण के लिए कोई लक्ष्य रखा है. किसानी का परिदृश्य बदला है। किसानों की जरूरतें बदली हैं। मौसम का मिजाज बदला हैफलस्वरूप फसल चक्र में भी बदलाव हुआ है। खानपान की आदतें भी बदल रही हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण खेती पर दबाव है। अधिक उत्पादन की चुनौतियां है। सीमित संसाधनों के बावजूद हमें जैव विविधताउच्च उत्पादकताखाद्य सुरक्षा आदि का भी ध्यान रखना है। ऐसे में एक ही रास्ता है कृषि शिक्षाअनुसंधान को बढ़ावा देनाइसे विश्वस्तरीय बनाना। सरकार का लक्ष्य है कि कृषि शिक्षा में बदलाव जो कि हमारे देश के बहुसंख्य आबादी को आकांक्षाओं को पूरा कर सके। उस दिशा में हमने तेजी से कदम बढ़ाया है। खेती-किसानी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रक्षेत्र है पशुपालन। पशुचिकित्सा के क्षेत्र में भी बड़े व सकारात्मक बदलाव किये गये हैं। माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की हमेशा से ये परिकल्पना रही है कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होजिसके जरिए हमारे युवाओं को रोजगार मिले। इसी क्रम में माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 25 जुलाई, 2015 को आरम्भ किए गए स्टूइडेंट रेडी (ग्रामीण उद्यमशीलता जागरूकता विकास योजना) कार्यक्रम के अनुपालन के साथ ही उनके निर्देशानुसार कृषि के पारंपरिक पाठ्यक्रमोंमूल और बुनियादी जरूरतों का समावेश कर कृषि स्नातक स्तर पर एक व्यावसायिक पाठ्यक्रम निर्माण के लिए सुझाव देने के लिए कृषि मंत्रालय ने पाँचवी डीन्स कमेटी का गठन किया गया। हमने कृषि विज्ञान के पाठ्यक्रम और विषय-वस्तु में सुधार के लिए गठित पांचवीं डीन कमेटी की सिफारिश को मंजूरी दी है। कृषि-विज्ञान के स्नातक स्तर के कोर्स में भारी बदलाव किए गये हैं और इन्हें अब व्यवहारिक अनुभव के साथ व्यवसायिक और रोजगारोन्मुख बना दिया गया है। यह जल्द ही देश भर के कृषि विश्वविद्यालयों में लागू हो जाएगा। नये पाठ्यक्रम में पारंपरिक कृषि कोर्सप्रौद्योगिकी कोर्सप्रतिभा उन्नति कोर्स एवं कृषि व्यापारिक कोर्स का समावेश किया है। इसके जरिए कृषि शिक्षा में आये व्यापक बदलावों को देखें तो स्पष्ट है कि हमारा जोर कृषि शिक्षा के साथ इसके प्रायोगिक इस्तेमाल पर है। छात्र कृषि विश्वविद्यालयों से पढ़ाई करके निकले और उन्हें रोजगार मिले। स्टूडेंट रेडी कार्यक्रम वर्ष 2016-17 के सत्र से लागू होगी। यह कार्यक्रम कृषि स्नातकों में व्यवहारिक अनुभव तथा उद्यमता कौशल प्राप्त करने के लिए अवसर प्रदान करने के लिहाज से एक नया कार्यक्रम है। इस योजना के तहत स्नातक विद्यार्थी के लिए ग्रामीण कार्य अनुभव के लिए छात्रवृति 750 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दी गयी है। इसके साथ ही कृषि विज्ञान की स्नातक स्तर की सभी डिग्रियों को व्यावसायिक डिग्री घोषित कर दिया गया है। इतना ही नहीं हमने स्नात्कोत्तर स्तर पर भी बदलाव किये हैं। वर्ष 2016-17 से स्नात्कोत्तर विद्यार्थियो की राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृति रू॰ 3000/- प्रतिमाह एवं स्नातक विद्यार्थियो को रू॰ 1000/- प्रतिमाह से बढ़ाकर रू॰ 2000/- प्रतिमाह कर दी गई है। इसके साथ ही सभी  राज्यों में एमेरिटूस वैज्ञानिक एवं एमेरिटूस प्रोफेसर की संख्या 50 से बढ़ाकर 100 कर दी गई और इसकी अवधि बढ़ाकर से वर्ष कर दी गयी है। उनकी परिश्रमिक राशि रु॰ 25,000/- से बढ़ाकर रु॰ 50,000/- प्रतिमाह कर दी गई है। दो नये केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना भी की गयी है। कृषि विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों की संख्या में भारी बढ़ोतरी करने के साथ ही केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालयों के अधीन महाविद्यालयों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है और 2016 में ऐसे महाविद्यालयों की संख्या बढ़कर 21 हो जाएगी। साथ हीराज्य कृषि विश्वविद्यालयों में अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट में आईसीएआर के माध्यम से छात्रों के नामांकन में वर्ष 2013 के मुकाबले वर्ष2015 में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन सब बदलावों के मद्देनजर आपके जेहन में ये सवाल जरूर उठेगा कि आखिर इसका फायदा क्या होगा। फायदा आगे आने वाले वर्षों में दिखाई देगा। कृषि शिक्षा की व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव दिखाई देगा। इसके विभिन्न आयाम हैं। पहले वर्ष में मूल तथा मौलिक पाठ्यक्रम पर जोर होगावहीं दूसरे वर्ष में छात्र  सिद्धांत से अवगत होंगे। तीसरे वर्ष में उत्पादन प्रणाली को समझने-समझाने का प्रयास होगा वहीं चौथे वर्ष में पूरा जोर कौशल तथा उद्यमिता विकास पर होगा। मसलनविश्वविद्यालयों में प्रवेश से लेकर शिक्षा समाप्ति तक पूरी रूपरेखा तैयार की गयी है। उद्देश्य साफ हैयदि कृषि शिक्षा बदलेगीपाठ्यक्रम बदलेकृषि स्नातकों के रोजगार पर जोर होगायुवाओं को रोजगार मिलेगा तो इससे किसानों को भी फायदा होगा। हमारे कृषि प्रोफेशनल उन्हें खेत से लेकर बाजार तक की योजनाओं की जानकारी देंगेउन्हें उनके काम में मदद करेंगे और खेती-बारी में तरक्की होगी। कृषि क्षेत्र रोजगार परक होने के साथ ही व्यवसायिकता की ओर उन्मुख होगा।  स्टूडेंट रेडी पाठ्यक्रम की रूपरेखा को देखें तो इसमें पाँच नए आयाम हैं मसलन अनुभवनात्मक प्रशिक्षणकौशल शिक्षाग्रामीण कार्य अनुभवऔधोगिकी प्रशिक्षण एवं प्रोजेक्ट वर्क्स आदि। इस दौरान कृषि-अभियांत्रिकीबायो तकनीकीडेयरी  तकनीकमात्सयकी पर जोर दिया जायेगा। साथ ही बागवानीउद्यानिकी एवं सेरिकल्चर के लिए बनेगा समसामयिक पाठ्यक्रम नये विषय जैसे बायोटेक्नोलोजीकम्यूनिटी साइंसफूड न्यूट्रीसन एवं  डायटिक्स और सेरिकल्चर शिक्षा जैसे विषय भी शामिल किए गये हैं। बदलाव की यह प्रक्रिया यहीं नहीं रूकी। खेती-किसानी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रक्षेत्र है पशुपालन। पशु चिकित्सा के क्षेत्र में भी बड़े व सकारात्मक बदलाव किये गये हैं। यहां भी इस बात पर जोर दिया गया कि छात्रों को व्यवहारिक व प्रायोगिक शिक्षा मिले जिससे कि उन्हें रोजगार पाने में आसानी हो। इस लिहाज से पशु चिकित्सा के संबंध में न्यूनतम मानकों में बदलाव किये गये हैं। इस दौरान मौजूदा विसंगतियों को दूर करने के साथ ही सामाजिक जरूरतों का भी ध्यान रखा गया है। जैसे कि एमएसवीई में बी.वी.एस.सी और एएच पाठयक्रम में वार्षिक प्रवेश में सीटों की संख्या बढ़ाकर 60 से बढ़ाकर 80 करना,  पाठ्यक्रमों के समय को से बढ़ाकर 5 ½ वर्ष करनाइंटर्नशिप कार्यक्रम को माह से बढ़ाकर एक वर्ष करना व और पाठ्य कार्य को 4 ½ वर्ष किया गया है। इसके साथ ही बी.वी.एम.सी और एएच कार्यक्रम में प्रवेश की आयु 17 वर्ष करने के साथ अधिकतम आयु सामान्य श्रेणी के लिए 25 वर्ष और एससी/ एसटी/ ओबीसी श्रेणी के लिए 30 वर्ष तक सीमित करने का सुझाव है। बड़ी बात यह है कि एससी और एसटी/ओबीसी तथा शारीरिक रूप से दिव्यांगो के लिए आरक्षण नीति शुरू किया गया है। यह व्यवस्था पहले के एमएसवीई में नहीं थी। इस लिहाज से  कई नये क्षेत्र भी शामिल किये गये मसलन फेलीन मेडिसिनतंत्रिका विज्ञानवैकल्पिक पशुचिकित्सा औषधिछोटे पशुओं की महत्वपूर्ण देखभालगैर-स्तन धारी औषधिक्रीडा पशु औषधिऔषधि डिजाइनिंग आदि शामिल किये गए हैं।  इसके अलावा कुछ अतिरिक्त पाठ्यक्रम भी शामिल किये गए हैंजिनका मुख्य जोर वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देना और छात्रों को इन विषयों में पारंगत करना है। 

लेखक : वी.के शर्मा संपादक 



V.K Sharma
Editor in Chief
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